चंडीगढ़: “कला एवं साहित्य का समाज में योगदान” विषय पर एक विचारगोष्ठी का आयोजन किया गया, जिसमें साहित्य, कला और संस्कृति से जुड़े प्रतिष्ठित विद्वानों ने भाग लिया। इस अवसर पर ग्रेट ब्रिटेन से पधारे प्रख्यात कलाकार एवं साहित्यकार सुरेश पुष्पाकर ने मुख्य वक्ता के रूप में अपने विचार रखते हुए कहा, “जब कोई सभ्यता समय के गर्त में विलीन हो जाती है, तब उसकी कला और साहित्य ही शेष रहते हैं, जो उस युग की महिमा और विचारों को इतिहास में अमर कर देते हैं।” उन्होंने आगे कहा कि किसी भी समाज की पहचान उसकी कला और संस्कृति से होती है, जो समय के साथ विकसित होकर आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा स्रोत बनती है।
ईनू शर्मा ने विषय पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि “कला और साहित्य भाषा, धर्म, जाति और भौगोलिक सीमाओं से परे जाकर लोगों को जोड़ने की शक्ति रखते हैं। चाहे वह भारत का शास्त्रीय संगीत हो या विश्व साहित्य के महान ग्रंथ, ये सभी मानवता के साझा अनुभवों को उजागर करते हैं और एकता का संदेश देते हैं।”
डॉ. विनोद शर्मा ने अपने वक्तव्य में कहा कि “कला एवं साहित्य समाज को नई दिशा प्रदान करते हैं। कोई भी समाज कला एवं साहित्य से अछूता नहीं रह सकता । प्राचीन काल से कला एवं साहित्य का संगम देखने को मिलता है जहाँ हमने देखा कि कला एवं साहित्य का किसी भी सम्यता पर गहरा प्रभाव रहा है।”
वहीं, डॉ. संगीता शर्मा कुंद्रा ‘गीत’ ने चर्चा को आगे बढ़ाते हुए कहा, “साहित्य किसी भी समाज का लिखित रूप होता है, जो न केवल जागरूकता और ज्ञान प्रदान करता है, बल्कि मनोरंजन और कलात्मक अभिव्यक्ति का भी एक सशक्त माध्यम है। चित्रकला, संगीत, नृत्य और साहित्य, सभी कला के विविध रूप हैं, जो समाज को जीवंत बनाए रखते हैं।”
इस अवसर पर विमला गुगलानी ने कला और साहित्य के समाज में योगदान को रेखांकित करते हुए कहा कि “सामाजिक विडंबनाओं को उजागर करना और उन्हें दूर करने के लिए सही दिशा-निर्देशन करना कला और साहित्य का प्रमुख उद्देश्य है।”
विनोद खन्ना ने अपने विचार रखते हुए कहा कि “आधुनिक समाज में साहित्य केवल अतीत का दस्तावेज़ नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य को आकार देने वाली जीवंत आधारशिला है।”
कार्यक्रम के संचालक प्रेम विज ने कहा कि “कला और साहित्य किसी भी समाज की सांस्कृतिक धरोहर को संजोकर रखते हैं। परंपराएँ, लोककथाएँ, रीति-रिवाज और मूल्य पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित करने में इनकी अहम भूमिका होती है।”
के. के. शारदा ने भी इस विषय पर अपने विचार साझा किए।
अंत में, प्रेम विज ने सभी अतिथियों को इस सार्थक चर्चा में भाग लेने के लिए धन्यवाद ज्ञापित किया और इस प्रकार की परिचर्चाओं को भविष्य में भी जारी रखने की आवश्यकता पर बल दिया।







