धर्मशाला, 12 अगस्त 2026। विजिलेंस अधिकारियों के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई के लिए माननीय अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, धर्मशाला की अदालत का दरवाजा खटखटाने के बाद अपने विरुद्ध FIR दर्ज होने और उसके बाद जारी नोटिस की विषय-वस्तु कार्यालय में तामील होने से एक दिन पहले ही मीडिया में उपलब्ध होने को लेकर सुधीर शर्मा ने गंभीर सवाल उठाए हैं। सुधीर शर्मा का कहना है कि पूरे घटनाक्रम को अलग-अलग घटनाओं के रूप में नहीं, बल्कि उसके समय और क्रम के आधार पर देखा जाना चाहिए, क्योंकि घटनाओं की श्रृंखला उनके खिलाफ दबाव, प्रतिशोध और पूर्वाग्रहपूर्ण सार्वजनिक धारणा बनाए जाने की आशंका पैदा करती है।
सुधीर शर्मा ने कहा कि संबंधित नोटिस 11 अगस्त 2026 को ही मीडिया में उपलब्ध/प्रसारित हो गया था, जबकि वही नोटिस 12 अगस्त 2026 को उनके कार्यालय में तामील किया गया। उन्होंने कहा कि यदि नोटिस का उद्देश्य संबंधित व्यक्ति को आरोपों या कार्रवाई की जानकारी देकर उसका पक्ष रखने का अवसर देना था, तो यह गंभीर सवाल है कि नोटिस की विषय-वस्तु उसके कार्यालय में तामील होने से एक दिन पहले ही मीडिया तक कैसे और क्यों पहुंची। उनके अनुसार, इस घटनाक्रम से यह आशंका पैदा होती है कि उन्हें अपना पक्ष रखने का प्रभावी अवसर मिलने से पहले ही उनके विरुद्ध सार्वजनिक धारणा बनाने का प्रयास किया गया।
उन्होंने कहा कि मामले को इसलिए भी गंभीरता से देखा जाना चाहिए क्योंकि उनके द्वारा अपने विरुद्ध की जा रही कार्रवाई तथा कथित उत्पीड़न को लेकर माननीय अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, धर्मशाला के समक्ष विजिलेंस अधिकारियों के विरुद्ध कानूनी कार्यवाही शुरू की गई थी। इसके बाद उनके विरुद्ध FIR दर्ज की गई। सुधीर शर्मा ने कहा कि घटनाओं का यह समय और क्रम प्रतिशोध की आशंका पैदा करता है और इसलिए इसकी स्वतंत्र जांच होनी चाहिए कि क्या उनके द्वारा न्यायालय की शरण लेने तथा अपने वैधानिक अधिकारों का प्रयोग करने के बाद जांच प्रक्रिया का इस्तेमाल उन पर दबाव बनाने के लिए किया गया।
सुधीर शर्मा ने स्पष्ट किया कि किसी भी व्यक्ति को किसी प्राधिकारी की कार्रवाई के विरुद्ध सक्षम न्यायालय का दरवाजा खटखटाने का कानूनी अधिकार है और इस अधिकार के प्रयोग को किसी भी परिस्थिति में दबाव, उत्पीड़न, प्रतिशोध या डराने का आधार नहीं बनाया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि उन्हें न्यायपालिका और कानून के शासन पर पूरा विश्वास है तथा वे कानून के अनुसार उपलब्ध सभी वैधानिक उपायों का प्रयोग करते रहेंगे।
नोटिस के मीडिया में पहले उपलब्ध होने के मुद्दे पर उन्होंने कहा कि 11 अगस्त को नोटिस की विषय-वस्तु का मीडिया में पहुंच जाना और 12 अगस्त को उसी नोटिस का उनके कार्यालय में तामील होना अपने आप में जांच का विषय है। उन्होंने कहा कि दोनों नोटिस की प्रतियां साथ संलग्न की जा रही हैं, ताकि नोटिस की तारीख और तामील की तारीख के बीच का अंतर स्पष्ट रूप से सामने आ सके। उनके अनुसार, यदि किसी व्यक्ति को अपना पक्ष रखने से पहले ही उसके विरुद्ध कार्रवाई की जानकारी सार्वजनिक हो जाती है, तो इससे उसके खिलाफ पूर्वाग्रहपूर्ण माहौल बनने की पूरी संभावना रहती है।
सुधीर शर्मा ने कहा कि वे किसी भी वैधानिक, निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच अथवा पूछताछ में पूरा सहयोग करने के लिए तैयार हैं, लेकिन किसी जांच या प्रशासनिक प्रक्रिया को उत्पीड़न, धमकी, दबाव अथवा मीडिया ट्रायल का माध्यम नहीं बनाया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि केवल किसी व्यक्ति के विरुद्ध आरोप लगाए जाने से उसे सार्वजनिक रूप से दोषी नहीं माना जा सकता। उचित प्रक्रिया यह है कि आरोपों की निष्पक्ष जांच हो, संबंधित व्यक्ति को अपना पक्ष रखने का पूरा और प्रभावी अवसर मिले तथा सक्षम प्राधिकारी उपलब्ध तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर स्वतंत्र निर्णय ले।
उन्होंने मांग की कि सबसे पहले यह स्पष्ट किया जाए कि 11 अगस्त 2026 को नोटिस की विषय-वस्तु मीडिया तक किस माध्यम से और किसके जरिए पहुंची, जबकि 12 अगस्त को इसकी तामील उनके कार्यालय में हुई। इसके साथ ही यह भी जांचा जाना चाहिए कि क्या नोटिस की विषय-वस्तु को तामील से पहले सार्वजनिक किए जाने के कारण उनके विरुद्ध किसी प्रकार की पूर्वाग्रहपूर्ण सार्वजनिक धारणा बनाने का प्रयास हुआ।
सुधीर शर्मा ने यह भी मांग की कि विजिलेंस अधिकारियों के विरुद्ध उनके द्वारा माननीय अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, धर्मशाला के समक्ष कानूनी कार्यवाही शुरू किए जाने और उसके बाद उनके विरुद्ध FIR दर्ज किए जाने के समय, परिस्थितियों और कारणों की स्वतंत्र जांच की जाए। उन्होंने कहा कि यह भी स्पष्ट किया जाना आवश्यक है कि क्या उनके कानूनी अधिकारों का प्रयोग करने के कारण प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से किसी जांच एजेंसी की कार्रवाई के माध्यम से उन पर दबाव बनाने का प्रयास किया गया।
उन्होंने कहा कि जांच लंबित रहने के दौरान किसी भी पक्ष की चयनात्मक, एकतरफा अथवा अपूर्ण जानकारी को मीडिया में इस प्रकार प्रसारित नहीं किया जाना चाहिए, जिससे मामले में पहले से कोई धारणा बन जाए। उन्होंने प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप पूर्ण एवं प्रभावी सुनवाई का अवसर दिए जाने तथा किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले उनके पक्ष और उपलब्ध दस्तावेजों पर निष्पक्ष रूप से विचार किए जाने की मांग की।
सुधीर शर्मा ने कहा कि मुद्दा केवल एक नोटिस या एक FIR का नहीं है, बल्कि यह सवाल है कि क्या कोई व्यक्ति किसी प्राधिकारी की कार्रवाई के विरुद्ध न्यायालय का दरवाजा खटखटाकर कानूनी संरक्षण मांगता है, तो उसके बाद उसे जांच के नाम पर दबाव का सामना करना पड़ेगा और उसके विरुद्ध चल रही कार्रवाई की जानकारी उसे नोटिस तामील होने से पहले ही मीडिया के माध्यम से सार्वजनिक कर दी जाएगी। उन्होंने कहा कि घटनाओं का समय और क्रम गंभीर सवाल पैदा करता है और इन सभी पहलुओं की स्वतंत्र, निष्पक्ष तथा बिना किसी राजनीतिक या सरकारी प्रभाव के जांच आवश्यक है।
अंत में सुधीर शर्मा ने कहा कि उन्हें न्यायपालिका और कानून के शासन में पूर्ण विश्वास है। वे सभी तथ्यों और उपलब्ध दस्तावेजों को सक्षम न्यायिक एवं कानूनी प्राधिकारियों के समक्ष प्रस्तुत करेंगे तथा कानून के अनुसार अपने सभी अधिकारों और वैधानिक उपायों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध रहेंगे।