संवाददाता, शिमला: पूर्व राष्ट्रपति भारत रत्न प्रणब मुखर्जी के निधन पर सोमवार 31 अगस्त से 6 सितम्बर तक पूरे देश में 7 दिन का राजकीय शोक घोषित किया है। राजकीय शोक की अवधि में समस्त शासकीय भवनों और अन्य स्थानों, जहां पर नियमित रूप से राष्ट्रीय ध्वज फहराए जाते हैं, वहां पर 6 सितम्बर तक राष्ट्रीय ध्वज आधे झुके रहेंगे। इस दौरान शासकीय स्तर पर कोई मनोरंजन, सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित नहीं किया जाएगा।
केंद्रीय गृह मंत्रालय ने इस संबंध में आदेश जारी किए हैं। गृह मंत्रालय के संयुक्त सचिव अनुज शर्मा ने कहा है कि दिवंगत आत्मा के सम्मान में देश भर में सात दिन का राजकीय शोक रहेगा। प्रणव मुखर्जी का अंतिम संस्कार राजकीय सम्मान के साथ होगा, जिसकी तिथि, समय और स्थान की घोषणा बाद में की जाएगी।
प्रणब मुखर्जी का लंबा राजनीतिक जीवन
प्रणब मुखर्जी का लंबा राजनीतिक जीवन रहा और उन्होंने ऐजॉय मुखर्जी की बांग्ला कांग्रेस से अपनी राजनीतिक सफर शुरू किया। 1969 में वह बांग्ला कांग्रेस के प्रतिनिधि के रूप में राज्य सभा के सदस्य बने। बाद में वह इंदिरा गांधी की निगाहों में आ गए। यह कैसे हुआ, इसके पीछे भी एक प्रसिद्ध कहानी है, जो आज भी प्रासंगिक लगती है।
1969 में इंदिरा गांधी बैंकों के राष्ट्रीयकरण के लिए तैयारी में थीं और मोरारजी देसाई को वित्त मंत्री के रूप में हटा दिया गया था, जिसके लिए एक कारण यह था कि वे उस सिंडिकेट के बीज रोपण कर रहे थे, जो इंदिरा गांधी के खिलाफ जाता। वहीं उनकी दृष्टि और विचारधारा दक्षिणपंथी (राइट विंग) की थी और वह बैंकों के राष्ट्रीयकरण के खिलाफ थे।
इंदिरा गांधी ने केंद्र के स्वामित्व वाले निगमों और बैंकों के राष्ट्रीयकरण के महत्व को समझा और वह इसके साथ ही आगे बढ़ना चाहती थीं। यह वो समय था, जब एक दिन देर शाम को राज्यसभा लगभग खाली थी और वहां इंदिरा गांधी मौजूद थीं। उस समय उन्होंने सदन में प्रणब मुखर्जी का भाषण सुना।
मुखर्जी ने अपने भाषण में तमाम उदाहरण और तर्क पेश करते हुए समझाया कि बैंकों का राष्ट्रीयकरण करना क्यों आवश्यक है। उनके शानदार भाषण को सुनकर इंदिरा गांधी एक ही समय में हैरान और प्रभावित हुईं। उन्होंने उस समय के पार्टी के मुख्य सचेतक रहे ओम मेहता से पूछा कि वह नौजवान कौन है, जिन्होंने शानदार भाषण दिया है। ओम मेहता ने मुखर्जी के बारे में पता लगाया और गांधी को इसकी जानकारी दी थी।
तब से ही प्रणब मुखर्जी इंदिरा गांधी की नजरों में आ गए थे और धीरे-धीरे वह उनके पसंदीदा बन गए। कांग्रेस के साथ बांग्ला कांग्रेस के विलय के बाद जो हुआ, वह अब इतिहास है। वह इंदिरा गांधी के काफी करीबी बन गए। वह पी. वी. नरसिम्हा राव और मनमोहन सिंह के दौर में कांग्रेस पार्टी में सर्वव्यापी रहे।
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