पूनम मेहता, रामपुर: भारत में अनेकों ऐसे धार्मिक स्थल हैं जो अपने इतिहास के साथ साथ कुछ अनोखी परम्पराओं के कारण प्रसिद्ध है। देवभूमि हिमाचल प्रदेश में जिला शिमला के रामपुर बुशहर स्तिथ गॉंव कहूल में समुद्र तल से 11000 फुट की ऊंचाई पर माँ दुर्गा का एक स्वरुप विराजमान है जो की श्राई कोटि माता के नाम से बहुत प्रसिद्ध है। जहाँ पति-पत्नी एक साथ माँ दुर्गा के दर्शन नहीं कर सकते है।
पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह करीब पांच दशक बाद 2015 में ऐतिहासिक श्राईकोटी माता मंदिर में दर्शन करने पुत्र विक्रमादित्य जो की वर्तमान में शिमला के विधायक है उनके साथ पहुंचे थे। पूर्व मुख्यमंत्री ने इससे पहले भी श्राईकोटी माता मंदिर जाने का कार्यक्रम बनाया था, उन्होंने पुत्र की मनत मांगी थी। जिस कारण वो माता के दर्शन के लिए आना चाहते थे। लेकिन उस समय उनका यह कार्यक्रम सिरे नहीं लगा था। जैसे ही पूर्व मुख्यमंत्री ने सरटू से श्राईकोटी माता मंदिर का रास्ता तय करना आरंभ किया तो बादल बरसने लगे। सरटू से पूर्व मुख्यमंत्री आधे रास्ते तक सेना की जिप्सी में गए। इसके बाद सेना के घोडे़ विराट पर सवार होकर मंदिर के पास पहुंचे। यहां से पूर्व सीएम पैदल मंदिर तक गए। जिसके पश्चात मंदिर के द्वार तक सड़क का निर्माण किया गया।

आमतौर पर हिंदू परंपराओं और यज्ञ-पूजन में पति-पत्नी का एकसाथ शामिल होना मंगलकारी माना जाता है, लेकिन यहां एक ऐसा रिवाज है जिसके कारण पति-पत्नी एकसाथ दर्शन नहीं करते हैं। शास्त्रों में भी ऐसी कई कथाएं आती हैं जब किसी ने आध्यात्मिक व शुभ कार्य किया तो उसका जीवनसाथी भी उसमें शामिल हुआ हैं। परंतु हिमाचल प्रदेश का ये मंदिर इस मामले में अनोखा हैं। कहा जाता है कि जो पति-पत्नी एकसाथ इस मंदिर में दर्शन कर लेते हैं, उनके जीवन में अनेक कष्ट आते हैं और उन्हें अलग तक होना पड़ सकता है। इस कारण यहां पर दोनों पति -पत्नी जाते तो हैं किन्तु एक बाहर रह कर दुसरे का इंतज़ार करता हैं।
यहां दूर-दूर से लोग श्राई कोटि माता के दर्शन करने आते है। कहा जाता हैं की यहा पर सात कुए हैं जिन्हें ढूंढ़ने पर हर तमन्ना पूरी होती हैं परंतु इन सातों कुओं को ढूंढ़ पाना अत्यंत कठिन हैं। इन कुओं को ग्रामीण कुल देवी व देवता के नाम से जाना जाता हैं। इसी के साथ यह मंदिर नव विवाहित जोड़े को संतान प्रप्ति की पूजा के लिये भी अत्यधिक मान्यता रखता हैं ।
क्या कहती है प्राचीन कथा
मंदिर के साथ एक प्राचीन कथा भी जुड़ी हुई है। कहते हैं कि इसका संबंध भगवान शिव के परिवार से है। एक बार भगवान शिव ने अपने दोनों पुत्रों गणेश और कार्तिकेयजी को ब्रह्मांड का चक्कर लगाने को कहा तो कार्तिकेयजी ब्रह्मांड का चक्कर लगाने चले गए और गणेशजी ने अपने माता-पिता को ही ब्रह्मांड मानकर उनकी परिक्रमा कर ली।
कार्तिकेयजी को ब्रह्मांड का चक्कर लगाने में समय लगा। जब वे आए तो गणेशजी का विवाह हो गया था। इससे कार्तिकेयजी क्रोधित हो गए। उन्होंने प्रतिज्ञा कर ली कि वे कभी विवाह नहीं करेंगे।

जब मां पार्वती को कार्तिकेयजी की इस प्रतिज्ञा के बारे में मालूम हुआ तो वे भी नाराज हुईं। उन्होंने कहा कि जो भी पति-पत्नी एकसाथ इस मंदिर में दर्शन करेंगे उन्हें भविष्य में एकदूसरे से अलग होना पड़ेगा। यही कारण है कि आज भी यहां दंपत्ति एकसाथ पूजा नहीं करते।
लोगों की मान्यता है कि जो भी भक्त यहां मंदिर की इस परंपरा का पालन करते हुए दर्शन करता है, उसकी समस्त मनोकामनाएं मां भगवती जरूर पूर्ण करती हैं। इस मंदिर के पास कुदरत का बेहद खूबसूरत नजारा है। यह मंदिर सदियों से लोगों की आस्था का केंद्र बना हुआ है तथा मंदिर की देख- रेख माता भीमाकाली ट्रस्ट के पास है। घने जंगल के बीच इस मंदिर का रास्ता देवदार के घने वृक्षों से और अधिक रमणीय लगता है। शिमला पहुंचने के बाद यहां वाहन और बस के माध्यम से नारकंडा और फिर मश्नु गावं के रास्ते से होते हुए यहां पहुंचा जा सकता है।

