मोहाली। पंजाब के मोहाली स्थित सेक्टर-65 की बहुमूल्य 51 एकड़ व्यावसायिक भूमि से जुड़े बहुचर्चित धोखाधड़ी मामले में जिला अदालत ने बड़ा फैसला सुनाते हुए मुख्य आरोपित परवीन गर्ग, वेद प्रकाश गर्ग और आदर्श गर्ग की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी है। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश हरदीप सिंह की अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट कहा कि मामला अत्यंत गंभीर प्रकृति का है तथा निष्पक्ष जांच के लिए आरोपितों से हिरासत में पूछताछ (Custodial Interrogation) आवश्यक है।
पुलिस के अनुसार तीनों आरोपित फिलहाल गिरफ्तारी से बचने के लिए फरार बताए जा रहे हैं। अदालत के फैसले के बाद पुलिस द्वारा उनकी गिरफ्तारी की कार्रवाई तेज किए जाने की संभावना है।
क्या है पूरा मामला
मामला मोहाली के थाना सोहाना में दर्ज एफआईआर से जुड़ा है, जिसमें भारतीय दंड संहिता के तहत धोखाधड़ी, जालसाजी, आपराधिक विश्वासघात तथा आपराधिक षड्यंत्र जैसी गंभीर धाराएं लगाई गई हैं।
शिकायतकर्ता पंचकूला निवासी शिव अग्रवाल ने आरोप लगाया है कि 14 मार्च 2022 को डी.एस. बिल्डटेक फर्म में उनकी हिस्सेदारी खरीदने के लिए एक एमओयू (Memorandum of Understanding) किया गया था। समझौते के अनुसार लगभग 4.27 करोड़ रुपये प्रति एकड़ की दर से भुगतान होना था, लेकिन आरोप है कि तय राशि का एक भी रुपया अदा नहीं किया गया।
शिकायत में कहा गया है कि आरोपितों ने विश्वास हासिल कर एमओयू और अन्य दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करवा लिए तथा बाद में उन्हीं दस्तावेजों का उपयोग कर फर्म और उसकी करोड़ों रुपये मूल्य की व्यावसायिक जमीन पर कब्जा करने का प्रयास किया।
बैक-डेटेड दस्तावेज तैयार करने का आरोप
एफआईआर के अनुसार एमओयू, पार्टनरशिप डीड और डिसॉल्यूशन डीड पर एक साथ हस्ताक्षर करवाए गए थे और दस्तावेज एक मध्यस्थ के पास रखे गए। बाद में शिकायतकर्ता की जानकारी के बिना इन्हें रजिस्ट्रार कार्यालय में प्रस्तुत कर फर्म की 45 प्रतिशत हिस्सेदारी ट्रांसफर कर दी गई।
आरोप है कि 1 अप्रैल 2022 की बैक-डेटेड पार्टनरशिप डीड तैयार कर शिकायतकर्ता को फर्म से बाहर दिखाया गया और उसके बाद नई फर्म बनाकर पुरानी फर्म के नाम खरीदी गई जमीनों को नई कंपनी में स्थानांतरित करने की कोशिश की गई।
जांच में सामने आईं कई गड़बड़ियां
पुलिस जांच के दौरान एमओयू, पार्टनरशिप डीड, डिसॉल्यूशन डीड, रजिस्ट्रार कार्यालय के रिकॉर्ड तथा संबंधित गवाहों के बयान खंगाले गए। जांच में दस्तावेजों की तारीखों में गंभीर विसंगतियां सामने आईं।
पुलिस के अनुसार जिस 1 अप्रैल 2022 की पार्टनरशिप डीड के आधार पर बदलाव दिखाया गया, उसके बाद भी अक्टूबर 2022 तक जमीनों की रजिस्ट्रियां पुरानी फर्म के नाम पर होती रहीं। इसके अतिरिक्त शिकायतकर्ता की पूंजी को उनकी सहमति के बिना फर्म की बैलेंस शीट में “अनसिक्योर्ड लोन” के रूप में दर्शाने का भी आरोप लगाया गया है।
अदालत की सख्त टिप्पणी
सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने इसे दीवानी विवाद बताया, जबकि राज्य सरकार और शिकायतकर्ता की ओर से इसे सुनियोजित आर्थिक धोखाधड़ी बताया गया।
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने कहा कि पूरे मामले का केंद्र एमओयू और उससे जुड़े दस्तावेज हैं तथा प्रथम दृष्टया आरोप गंभीर दिखाई देते हैं। ऐसे मामलों में सच्चाई तक पहुंचने और पूरे षड्यंत्र की जांच के लिए आरोपितों से हिरासत में पूछताछ आवश्यक है। इसी आधार पर अदालत ने तीनों आरोपितों की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी।
आगे क्या
अदालत के आदेश के बाद अब पुलिस की जांच और तेज होने की संभावना है। यदि आरोपित शीघ्र आत्मसमर्पण नहीं करते हैं तो उनकी गिरफ्तारी के लिए आगे की कानूनी कार्रवाई की जा सकती है। यह मामला ट्राइसिटी क्षेत्र के सबसे बड़े भूमि विवादों में से एक माना जा रहा है और आने वाले दिनों में जांच के दौरान कई अन्य तथ्य सामने आने की संभावना है।
