वाहनं वृषभो यस्य वासुकिः कंठभूषणम् ।
वामे शक्तिधरं देवं वकाराय नमो नमः ॥५॥
अर्थात:में उन शिव को प्रणाम करता हूँ वृषभ जिनका वाहन है, और वासुकि उनके गले का आभूषण है।
जिनकी बायीं और शक्ति(माँ पार्वती) है और जिनको “व” के शब्द से भी जाना जाता है
महाशिरात्रि का त्यौहार हिन्दू सनातन परंपरा में बेहद विशेष स्थान रखता है। विशेष रूप से शैव समुदायों और उत्तर भारत में इस त्योहर के एक विशेष महत्व है। हिन्दू पंचांग के अनुसार पूरे वर्ष भर में लगभग 12 शिवरात्रियां पड़ती है और ये शिवरात्रियां प्रत्येक मास के किष्ण पक्ष की चतुर्दशी को होती है लेकिन फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को पड़ने वाली शिवरात्रि को “महाशिरात्रि” कहा जाता है और इसी दिन का सबसे ज़्यादा महत्व भी है।
क्यों है महाशिरात्रि का दिन इतना विशेष?
सनातन हिन्दू परंपरा में जितना महत्व शास्त्रों को दिया जाता है उतना ही महत्व “पंचांग” यानी हिन्दू कैलेंडर का भी है। पंचांग के हिसाब से कुछ दिनों को उस दिन ग्रहों की स्थिति के कारण बेहद विशेष माना गया है और “महाशिरात्रि” भी दो कारणों से बेहद महत्वपूर्ण है।
शास्त्रों के अनुसार भारतीय पंचांग की इसी तिथि को आदिदेव महादेव शिव ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हुए थे और तभी से ज्योतिर्लिंग के रूप में शिव पूजा को शिव प्राप्ति का सबसे अधिक साधक रास्ता माना जाता है।
इसके अलावा शास्त्रों में ऐसा उल्लेख भी मिलता है कि इस दिन माता पार्वती ने कठोर तप के बाद भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त किया था जिसके बाद आज ही के दिन भगवान शिव ने मां पार्वती से विवाह किया था।
इसलिए ये दिन विशेष महत्व रखता है हिमाचल के मंडी में लगने वाला साप्ताहिक महाशिवरात्रि मेला शिव और महाशिवरात्रि के हिमाचल कि संस्कृति में स्थान को बेहद अच्छे ढंग से प्रस्तुत करता है और आस्था का ये पर्व शिव भक्तों के लिए वर्ष का सबसे बड़ा त्यौहार है। इस दिन लोग व्रत करते हैं जागरण करते हैं और बड़ी धूम धाम से इस त्यौहार को मनाते हैं।

