पत्रकारिता के जीवित रहने के लिए सबसे महत्वपूर्ण तत्वों की सूची बनाई जाए और “स्वतंत्रता” उसमें सबसे ऊपर लिखा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। स्वतंत्रता वो महत्वपूर्ण अधिकार या उससे भी बढ़कर वह शक्ति है जो पत्रकारिता को हक देती है कहने का,सवाल पूछने का।
आज 3 मई को प्रेस स्वतंत्रता दिवस मनाया जा रहा है। विकट परिस्थितियां ना होती तो शायद अपने देश के कई हिस्सों में कितने ही कार्यक्रमों का आयोजन होता और उसमें प्रेस की स्वतंत्रता पर भाषण भी होते। मगर जमीनी स्तर पर वास्तविकता को देखें तो सवाल उठता है क्या? लोकतंत्र के चौथे स्तंभ से संबोधित किए जाने वाली पत्रकारिता अपने देश भारत में कितनी स्वतंत्र है। पिछले दिनों 2021 का प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स RSF, फ्रांस स्थित एक गैर सरकारी संगठन के द्वारा जारी किया गया। और 180 देशों के इस सूचकांक में भारतवर्ष 142 में पायदान पर था, हालांकि इससे पहले 2016 में भारत 133 वें पायदान पर था। RSF की रिपोर्ट्स कहती हैं कि भारत पत्रकारों के लिए विश्व के खतरनाक देशों में से एक है। RSF की रिपोर्ट के अनुसार भारत विश्व के उन देशों की श्रेणी में है जहां पत्रकारों को नौकरी प्राप्त करने के लिए जूझना पड़ता है। मुद्दों पर बात करने वाले पत्रकार को पर जानलेवा हमले हो जाते हैं और इसने पुलिस के द्वारा पत्रकारों पर की गई प्रताड़ना भी शामिल है।
इससे भी बड़ा आंकड़ा तो उन पत्रकारों का है जिनकी हत्या या धमकाने का काम राजनीतिक लोगों के द्वारा किया जाता है। इस सूचकांक की बात की जाए तो इसमें नॉर्वे स्वीडन फिनलैंड और डेनमार्क क्रमशाह शीर्ष 1ले,2रे,3रे और 4थे स्थान पर है। बड़े देशों की जाए संयुक्त राज्य अमेरिका इस सूची में 44 स्थान पर। श्रीलंका 127 वे स्थान पर तो पाकिस्तान 145 वे स्थान है वहीं रूस 150 वे स्थान पर और चीन 177 वे स्थान पर है।
भले ही ये सूची एक विदेशी गैर सरकारी संगठन के द्वारा जारी कि गई हो और भारत के भीतर बहुत से लोगों के लिए ये सही भी ना हो और यह भी संभव हो सकता है कि यह सूचकांक पश्चिम के उसी विचार से प्रेरित हो जिसका हवाला राष्ट्रवादी लोग देते हैं। मगर इस बात को तो झुठलाया नहीं जा सकता कि देश के अंदर पत्रकारों को नौकरियों की समस्या से जूझना पड़ता है और यह भी सत्य है की अनेकों ही पत्रकारों को उनकी खबरों के लिए मार दिया जाता है या धमकाया जाता है।
अब महत्वपूर्ण बात ये है कि क्या पत्रकारों की स्वतंत्रता के हनन के लिए केवल देश का शासन जिम्मेदार है या केवल शासन को जिम्मेदार ठहरा कर हम कोई भूल कर रहे हैं। इतिहास खोल कर देखें तो जब जब शासन या समाज के उच्च वर्ग के हितों के टकराव लेखकों पत्रकारों से हुए हैं तो हमेशा या तो इस वर्ग को पीछे हटना पडा या जेलों में जाना पड़ा या जान गवानी पड़ी। यह समझना भूल ही होगी कि केवल सत्ता से ही प्रेस की स्वतंत्रता का हनन होता है। आर्थिक रूप से होने वाली स्वतंत्रता के हनन का तो कोई ब्योरा ही नहीं मिलता और यह बेहद गंभीर है।
ख़ैर प्रेस की स्वतंत्रता को बनाए रखने के लिए क्या किया जाए यह अहम बात है। और क्या सरकारें इस दिशा में काम कर सकती हैं मगर यह सवाल पूछते ही सरकारों की इच्छा शक्ति का ख्याल आपको इस सवाल का जवाब तुरंत दे देगा।


