अफ़ग़ानिस्तान में दशकों के बाद एक बार फिर इतिहास ख़ुद को दोहराता नज़र आ रहा है। तालिबान ने अफ़ग़ानिस्तान के 34 प्रोविंस में से 25 को अपने कब्जे में ले लिया है और तालिबानी लड़ाके राजधानी काबुल के दर पर पहुंच चुके हैं। जहां एक तरफ अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी सत्ता से त्याग पत्र देकर देश से बाहर निकल चुके हैं तो वहीं दूसरी ओर रविवार से लोगों के देश छोड़ कर बाहर जाने के दयनीय वीडियो भी लगातार वायरल हो रहे हैं। मगर अफ़ग़ानिस्तान में स्थिति इतनी बिगड़ी कैसे? यह समझने के लिए समय और तारिक में थोड़ा पीछे जाना होगा
अफगानिस्तान का एक राष्ट्र के रूप में उद्भव और राजनीतिक उठापटक
कबीलों में बंटे अफगानिस्तान की एक राष्ट्र के रूप में परिकल्पना के बीज अहमद शाह अब्दाली के सत्ता में काबिज होने के बाद पढ़े। मगर ज्यादा वक्त तक के लिए यह प्रांत संगठित नहीं रह सके और अब्दाली के सत्ता से जाते ही अफगानिस्तान फिर से कबीलों में बट गया। इसके बाद काल आया अंग्रेजों का, कभी ना सूरज अस्त होने वाले राज्य के पैर अफगानिस्तान तक भी पहुंच गए। अफगानिस्तान और अंग्रेजों के बीच जो तब भारत पर राज कर रहे थे तीन युद्ध हुए, पहले युद्ध को जीतने के बाद अफगानिस्तान अगले युद्ध हार गया और अफगानिस्तान का कुछ क्षेत्र अंग्रेजो के कब्जे में चला गया।
अफगानिस्तान बनने का दूसरा पड़ाव शुरू हुआ 1919 में, जब दूसरा विश्वयुद्ध खत्म हो चुका था और साम्राज्यवादी अंग्रेजों की जड़े कमजोर पड़ने लगी थी और इसका परिणाम देखने को भी मिला जब अफगानिस्तान को ब्रितानिया हुकूमत से आजादी मिल गई। अफगानिस्तान से अंग्रेजों के जाने के बाद सत्ता की डोर राजशाही ने संभाली और सत्ता पर काबिज हुए अमानुल्लाह खान। मगर अफगानिस्तान के इतिहास में राजनीतिक परिदृश्य बदला 1933 से, जब जाहिर शाह तखत पर बैठे और उनके 40 सालों के शासन के दौरान अफगानिस्तान में कई राजनैतिक और सामाजिक बदलाव भी देखने को मिले। जिसमें महिलाओं की शिक्षा से लेकर अलग-अलग आयामों का विकास शुरू हुआ।
अफगानिस्तान में राजनीतिक संघर्ष की शुरुआत
साल 1973, राजनीतिक परिदृश्य ने एक और करवट ली और जाहिर शाह के चचेरे भाई मोहम्मद दाऊद ने सत्ता हथिया ली और इसमें उनका हथियार बनी कम्युनिस्ट विचारधारा से प्रेरित एक पार्टी, नाम था PDPA और जिसकी स्थापना 1965 में ही हो चुकी थी। मगर इस घटनाक्रम में नाटकीय ढंग से 1978 में फिर सत्ता परिवर्तन हो गया और जिसके कंधे पर मोहम्मद दाऊद कभी तख्त पर पहुंचे थे उसी PDPA ने उन्हें सत्ता से बाहर कर दिया और खुद सत्ता में काबिज हो गए।
1 साल के बाद यानी साल 1979 में इस कहानी में सोवियत रूस ने एक नए पात्र के रूप में प्रवेश किया और अगले 10 साल तक अफगानिस्तान सोवियत-अफगान युद्ध की आग में जलता रहा। साल 1989 में सोवियत की खाली हाथ वापसी हुई। मगर आज के खूनी संघर्ष की दास्तान इन्हीं 10 सालों के अंतराल में लिखी गई।

जब अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन ने मुजाहिदिनो से की मुलाकात
1979 में जब सोवियत अफगानिस्तान में दाखिल हुआ तो वैश्विक महाशक्ति बनने की दौड़ में सोवियत का विरोधी अमेरिका भी अफगानिस्तान के दंगल में कूद पड़ा। तब सत्ता पर PDPA का कब्जा था ऐसे में अमेरिका ने PDPA की खिलाफत करने वाले लोगों को अप्रत्यक्ष रूप से सैन्य प्रशिक्षण देना शुरू कर दिया। जिसमें उसका चेहरा बना पाकिस्तानी एजेंसी ISI और जन्म हुआ मुजाहिदीन लड़ाकों का। आंकड़े बयां करते हैं पाकिस्तान की मदद से तकरीबन 90,000 लड़ाके तैयार किए गए और इसी वक्त के भंवर में अरब के एक समृद्ध परिवार से एक लड़का अफगानिस्तान पहुंचा और बंद कर निकला आतंक का सरगना, नाम था ओसामा-बिन-लादेन।
फिर आया 90 के दशक और शुरआती 3 सालों में ही PDPA कि ओर से सत्ता पर बैठे मोहम्मद नाजिम उल्लाह को सत्ता से बाहर कर दिया गया। इसके बाद अफगानिस्तान में शांति लाने के प्रयास शुरू हुए और इसकी पहली झलक मिलती है साल 1992 में, जब पेशावर अकॉर्ड के दस्तावेजों पर हस्ताक्षर हुए और इस्लामिक मुल्क अफगानिस्तान को मान्यता मिल गई। इस समझौते के मुताबिक अगले डेढ़ सालों के लिए मुजादेदी के नेतृत्व में अंतरिम सरकार की स्थापित होनी थी और बाद में चुनाव होने थे, मगर कुछ ही महीनों में यह सरकार ढह गई। उधर इस समय तक आते-आते मुजाहिदीन कई छोटे-बड़े मगर शक्तिशाली धड़ों में बंट गए थे और परिणाम ये निकला, अगले 4 साल अफगानिस्तान गृह युद्ध की आग में जलता रहा। बंदरबांट का दौर ऐसा था, बाहरी देश अफगानिस्तान चला रहे थे। मुजाहिदीन लड़ाके जो कुछ छोटे-बड़े समूहों में बंट चुके थे उन्हें बाहर से देशों का समर्थन मिल रहा था। इसमें पाकिस्तान समर्थित हिज्ब-ए-इस्लामी था और सऊदी अरब समर्थित इतिहात-ए-इस्लामी, इसके अलावा हिज्ब-ए-वजालत को ईरान समर्थन दे रहा था। और इसी काल में अफगानिस्तान में आज के खूनी संघर्ष के बीज पढ़ें और शुरुआत हुई तालिबान की।
तालिबान के जन्म से सत्ता पर काबिज होने का सफर
मुल्लाह मोहम्मद ओमर ने 50 इस्लामिक धार्मिक छात्रों के साथ तालिबान की शुरुआत की, इस आंदोलन ने सशस्त्र आंदोलन का रूप ले लिया जिसके सूत्रधार थे पश्तून इस्लामिक छात्र जो पाकिस्तान के इस्लामिक पाठशालाओं और मदरसों में पढ़ रहे थे। देखते ही देखते यह आंदोलन किसी जंगल की आग की तरह बड़ा हो गया अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है, केवल कुछ ही महीनों में 15 हजार से अधिक इस्लाम से जुड़े धार्मिक छात्र जो इस्लामिक स्कूलों और मदरसों में पढ़ा करते थे इसका हिस्सा बन गए और महज 2 सालों में यानी 1996 में तालिबान अफगानिस्तान की सत्ता पर स्थापित हो गए और स्थापना हुई इस्लामिक अमीरात ऑफ अफगानिस्तान की जिसने अगले 5 साल तक अफगानिस्तान में एक अंधे युग के दौर को शुरू कर दिया जिसमे एक ओर तो इस्लामिक कट्टरता के साथ टीवी, फिल्में, सब पर प्रतिबंध लगा दिया गया तो दूसरी ओर अफगानिस्तान में औरतों के लिए स्थिति नर्क के समान हो गई। समय ऐसा था जिसमें अलकायदा का जन्म हुआ, जन्म हुआ जैश का और परिणाम निकले अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमला और भारत के ICJ 184 प्लेन का अपहरण।
2001 में अफगानिस्तान में आगमन हुआ नाटो सेनाओं का और जिसका प्रतिनिधित्व यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ अमेरिका के हाथों था। साल 2001 से 2014 तक तालिबान के साथ संघर्ष चलता रहा और 2014 तक आते-आते तालिबान कमजोर पड़ गए और सत्ता से बाहर हो गए। इसके बाद साल 2014 में तालिबान और नाटो सेनाओं के बीच चल आ रहे युद्ध को समाप्त करने की घोषणा कर दी गई और अफगानी सेना को प्रशिक्षण देने की बात की गई। अफगानिस्तान में सरकार की स्थापना हुई और सरकार का चेहरा बने हामिद करजई। वही हामिद करजई जो कभी हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला में स्थित है हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के छात्र रहे थे।
अफगानिस्तान की स्थिति और भारत का 23 हजार करोड़ का निवेश
अफगानिस्तान के साथ भारत के संबंध बरसो पुराने रहे हैं, दोनों देशों के बीच व्यापार लंबे समय से चलता आय है और यही कारण है, जब अफगानिस्तान राजनैतिक अंतर्द्वंद से गुजर रहा था तो ऐसे में भारत ने अफगानिस्तान की अर्थव्यवस्था और समाजिक विकास के लिए अफगानिस्तान में निवेश शुरू किया। निश्चित तौर पर अफगानिस्तान की अर्थव्यवस्था बढ़ती तो इससे भारत को भी लाभ होता और इसी उद्देश्य से 2011 में अफगानिस्तान और भारत के बीच भारत-अफगानिस्तान स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर हुए। जिसके अंदर भारत की तरफ से अफगानिस्तान में सड़क, बांध, स्कूल बनाने शुरू किए और दिलचस्प बात यह है अफगानिस्तान की संसद का निर्माण भी भारत की ओर से ही किया गया। दोनों देशों के बीच वर्तमान समय में एक बिलियन डालर से ज्यादा का व्यापार चल रहा है। जेनेवा में अपने भाषण के दौरान भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर जिक्र करते हैं, अफगानिस्तान का कोई भी क्षेत्र ऐसा नहीं है जहां पर भारत की ओर से जो प्रोजेक्ट चलाए जा रहे हैं उन्होंने 400 की संख्या को पार ना किया हो।

सलमा डैम हैरात, अफगानिस्तान
भारत के निवेश और अफगानिस्तान-भारत की मित्रता का प्रतीक बना हैरात में बना सलमा डैम, जिसे भारत-अफगानिस्तान फ्रेंडशिप डैम के नाम से ही पहचान मिली। इसके अलावा जो एक बड़ा प्रोजेक्ट भारत के लिए राजनीतिक दृष्टिकोण से बड़ा महत्वपूर्ण है, वह है जारांज-दालाराम हाईवे जिसे बीआरओ तैयार कर रहा है। दरअसल इस हाइवे को बनाने का मकसद भारत को रोड के माध्यम से यूरोप से जोड़ने का है जिसमें पाकिस्तान का क्षेत्र नहीं आता है और भारत बिना पाकिस्तान में घुसे, छोटी समुद्री यात्रा करके रोड पर माध्यम से यूरोप से जुड़ सकता है, जो न केवल व्यापार की नज़र से महत्वपूर्ण है अपितु रणनीतिक दृष्टिकोण से भी मायने रखता है।
भारत का अफगानिस्तान में लगभग 23 हजार करोड़ का निवेश है, जिस पर तालिबान के कब्जे के बाद काले बादल छाते हुए नजर आ रहे हैं। अफगानिस्तान कई मायनों में भारत के लिए एक अहम देश हो जाता है, मगर अफगानिस्तान में कट्टरपंथी तालिबान का फिर से शासन में लौटना दोनों देशों के रिश्तों पर कैसा असर डालता है यह आने वाले वक्त में साफ होगा।

