आखिर कौन सी इच्छा ले गई पठानिया को परमार के पास
अरविन्द कंवर
विधानसभा का विशेष सत्र बुलाने की जिस इच्छा को लेकर भाजपा के कद्दावर नेता और नूरपुर के विधायक राकेश पठानिया विधानसभा अध्यक्ष विपिन परमार के पास गए थे, अब वो उनके लिए एक बार फिर आफ़त बन गई है. कभी पूर्व मुख्यमंत्री प्रोफेसर प्रेम कुमार धूमल के कांगड़ा मे हनुमान कहे जाने वाले पठानिया 2015 मे पासा बदल गए और क्रिकेट मैच की राजनीति के रथ पर सवार हो कर भाजपा के मौजूदा अध्यक्ष जे पी नड्डा के कैम्प मे शामिल हो गए और अचानक से कांगड़ा की राजनीति में भूचाल आ गया था. उसके बाद नड्डा के कांगड़ा लोकसभा के हर दौरे के संचालक पठानिया बन गए, शायद उनको यह लगा कि नड्डा प्रदेश के अगले मुख्यमंत्री होंगे और उनका लगना भी वाजिब था क्योंकि 2014 के लोकसभा चुनावों के नड्डा को ही हिमाचल के भावी मुख्यमंत्री के रूप में देखा जा रहा था लेकिन विधानसभा चुनावो से ठीक पहले तत्कालीन भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष ने प्रो प्रेम कुमार धूमल को भाजपा का नेतृत्व दे दिया लेकिन वो चुनाव हार गए और जय राम ठाकुर मुख्यमंत्री बन गए. इस सारी राजनीतिक उठक पठक मे सबसे ज़्यादा नुकसान राकेश पठानिया का हो गया. धूमल खेमा छोड़ा और नड्डा मुख्यमंत्री बने नहीं. ऐसे में दोबारा मेहनत शुरू करनी पडी क्योंकि जयराम ठाकुर ने अपने मंत्रिमंडल पठानिया को मौका ही नहीं दिया लेकिन रास्ते बंद भी नहीं हुए क्योंकि किसी ना किसी वजह से मंत्री का कोई ना कोई पद खाली रहता ही रहा और पठानिया की मेहनत भी. इसमे कोई दो राय नहीं है कि पठानिया ने मंत्री बनने के लिए हर तरह की मेहनत और प्रयास किए हैं चाहे विधानसभा के अंदर सरकार को डिफेंड किया हो या मुख्यमंत्री को कांगड़ा के दौरों पर अपना भीड़ इकठ्ठी करके जलवा दिखाया हो, पठानिया ने कोई कसर नहीं छोड़ी परन्तु पठानिया वफादारी के लिटमस टेस्ट में फेल हो गए क्योंकि राजनितिक गलियारों में एक बात तो तय मानी जाती है कि पठानिया कब क्या कर दें इसकी कोई गारन्टी नहीं है खासकर जिस तरीके से धूमल खेमा छोड़ कर नड्डा मे आना और उसके बाद जयराम के साथ साये की तरह चलना. पठानिया की इसी अति महत्वाकांक्षा को शायद मुख्यमंत्री समझते हैं इसलिए दूर दूर रहते हैं परन्तु पठानिया भी अपनी कोशिश नहीं छोड़ते हैं और यही वजह है जो विधानसभा सत्र को बुलाकर सरकार की वाहवाही करने का तरीका निकाल दिया पर वो अपनी इच्छाओं को पूरा करने के चक्कर में सरकार को असहज कर गए और अब सरकार और पार्टी दोनों को ही डेमेज कंट्रोल करना पड गया और पठानिया की इच्छाओं को एक बार फिर ग्रहण लगता नजर आ रहा है. यहां एक और दिलचस्प बात यह है कि भाजपा के और वरिष्ठ नेता और मंत्रीपद के दावेदार रमेश ध्वाला भी इस मिशन में शामिल हो गए और युवा विधायकों विशाल नेंहरिया और अरुण कुमार जैसे ना केवल अपनी पार्टी की रेडार पर आ गए अपितु स्पष्टीकरण देते नहीं बन रहे हैं और तो और कूका का तो उस भी ज़्यादा बुरा हाल हुआ जो लाइव प्रसारण मे धक्के खाते हुए नजर भी आए. ऐसे में कोरोना के इस दौर में राकेश पठानिया अपनी राजनीति को निखारने के चक्कर में ना केवल दूसरों को भी असहज कर गए. मंत्री बने या नहीं ये तो भविष्य की बात है पर वर्तमान में सरकार को असहज करना पठानिया को महंगा पड सकता है







