स्पेशल स्टोरी: होली को रंगों का त्यौहार माना जाता है, होली कब है… ये तो सभी को पता होगा… पर क्या आपको पता है कि हम होली क्यों मनाते है। होली का नाम सुनते ही मन में खुशी, उत्साह और उल्लास की भावना उत्पन्न हो जाती है। होली एक ऐसा त्यौहार है जिसमें बच्चों से लेकर बूढ़े बुजुर्ग भी चहकने लगते है। भारत में अन्य त्यौहारों की तरह होली भी बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है।
होली के त्यौहार को सब खुशियों का त्यौहार भी कहते हैं। इस दिन लोग भेदभाव की भावना ऊंच-नीच अमीरी-गरीबी से ऊपर उठ एकजुटता से रंगों का त्यौहार मनाते है। होली का त्यौहार हर साल बसंत ऋतू के समय फागुन यानि की मार्च के महीने में आता है जिसे पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है और इसके आने पर सर्दियां खत्म और गर्मीयों की शुरूआत हो जाती है।
भारत के कुछ हिस्सों में इस त्यौहार को किसान अच्छी फसल पैदा होने की खुशी में भी मनाते है। होली का ये त्यौहार फागुन के अंतिम दिन होलिका दहन की शाम से शुरू होता है। जिसके अगले दिन सुबह सभी लोग आपस में मिलते हैं, गले लगते हैं एक दुसरे को रंग लगाते है। इस त्यौहार को एकता, प्यार, खुशी, सुख और बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में जाना जाता है।
होली क्यों मनाई जाती है
आखिर होली का त्यौहार क्यों मनाया जाता है… होली के इस त्यौहार से कई पुरानी कहानियां जुडी हुई हैं जिनमें से सबसे पुरानी कहानी है प्रह्लाद और उनकी भक्ति। माना जाता है कि प्राचीन काल में हिरण्यकश्यप नाम का एक बलशाली असुर था। अपने बल के इस घमंड में वह खुद को ही ईश्वर मानने लगा था। उसने अपने राज्य में ईश्वर का नाम लेने पर ही रोक लगा दी थी। हिरण्यकश्यप का पुत्र प्रह्लाद ईश्वर भक्त था। प्रह्लाद की ईश्वर भक्ति से नाराज होकर हिरण्यकश्यप ने उसे कई तरह के दंड दिए, लेकिन उसने ईश्वर की भक्ति करना नहीं छोड़ा।

हिरण्यकश्यप की बहन होलिका को वरदान प्राप्त था कि वह आग में भस्म नहीं हो सकती। हिरण्यकश्यप ने आदेश दिया कि होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर आग में बैठे। आग में बैठने पर होलिका तो जल गई, पर प्रह्लाद बच गया। जिसके बाद ये दिन बुराई पर अच्छाई की जीत से होली के रूप में मनाया जाने लगा।







