-अरविंद कंवर
आखिर एयर इंडिया को खरीददार मिल ही गया…वो भी अपना असली मालिक। जी, बिल्कुल सही पढ़ा आपने….असली मालिक इसलिए क्यूंकी एयर इंडिया शुरू करने वाले भी टाटा ही हैं। ये एक बिजनेस वेंचर था, जिसे भारत सरकार ने उस दौर में अपने हाथ में ले लिया। यहां से शुरु हुआ एयर इंडिया का नया सफर।

एयर इंडिया का सफर…
ये सफर कैसा रहा ये तो सभी जानते हैं….लेकिन इस पर मैं कुछ न कहुं ये भी मुनासिब नहीं है…..एयर इंडिया कुछ अच्छा नहीं कर पाई….सीधे और साफ शब्दों में कहुं तो एयर इंडिया फेल हो गई….दरअसल अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर मेरी बहुत ज्यादा हवाई यात्राएं होती रहती हैं। मेने लगभग हर एयरलाइंस मे सफर किया है…तो जाहिर है सभी एयरलाइंस में अंतर आसानी से बता सकता हूं।
नान स्टॉप उड़ानो में से एक है एयर इंडिया
सबसे पहले एयर इंडिया की खूबियों पर बात कर लेते हैं। यह दुनिया की किसी भी जगह पर नान स्टॉप जाती हैं। दुनिया में बहुत कम अंतरराष्ट्रीय उड़ाने हैं जो नान स्टॉप चलती हैं, एयर इंडिया उनमे से एक है। दूसरा बड़ा कारण ये है कि एयर इंडिया के पायलट बहुत बेह्तरीन हैं। अनुभवी होने के कारण आपको एयर इंडिया मे सफर करने मे बहुत आनंद आता है। तीसरा कारण है खाना, एयर इंडिया में बहुत स्वादिष्ट खाना परोसा जाता है।
खूबियों से खामियों तक…
एयर इंडिया की खूबियों की तो हम बात कर चुके हैं, अब जरा इसकी खामियां भी बता दूं…सबसे पहली और बड़ी खामी है समय पर ना उड़ना। एयर इंडिया की सबसे बड़ी दिक्कत टाइम मेनेजमेंट है, जो प्रतिस्पर्धा के जमाने में बहुत जरूरी है। दूसरा कारण ये है कि एयर इंडिया के जहाज, Dreamliner के अलावा एयर इंडिया ने कोई नया जहाज काफी समय से नहीं खरीदा है। तीसरा कारण है कि आतिथ्य और Professionalism यानी व्यावसायिकता की भारी कमी। चाहे एयरपोर्ट पर टिकट लेते समय हो या फ्लाइट में, ये कमी हर जगह दिखती है।

जब घंटी बजती रही….
एक किस्सा शेयर करता हूं..एक बार मैं विदेश से आ रहा था तो मेरे आगे की सीट पर एक सज्जन बैठे थे…शायद कुछ काम था उनको जिसके लिए वो बार-बार घंटी बजा रहे थे….लेकिन कोई जवाब नहीं आया…मैं ये सब देख रहा था, मैंने जाकर कर्मी दल(CREW) को बताया कि आपको बुला रहे हैं और आप सो रहे हो? हां, वो उस वक्त सच में सोए थे। सामने से जवाब था…कि मैं सारी रात सोया नहीं। मैंने भी तपाक से कहा कि इसमें हमारा क्या कसूर है?खैर बात को रफा-दफा किया। लेकिन आप समझ सकते हैं कि उलकी अप्रोच क्या रही होगी।
अफसरशाही हुई हावी…..
कारणों की तलाश में निकलेंगे तो पता चलेगा कि जब एयर इंडिया सरकार के हाथों में गई तो अफसरशाही भी हावी हुई। स्टाफ, नेताओं,अधिकारियों को ध्यान में रखकर पॉलिसी बनने लगीं। एयर इंडिया मे किसी भी कर्मचारी को उसके रैंक के हिसाब से परिवार के साथ मुफ्त यात्रा करने की सुविधाएं दी गईं।

मुफ्त की यात्रा….
इतना ही नहीं मेरे एक मित्र ने तो यहां तक बताया कि वो महज चार हजार रुपये मे अमेरिका जा कर आ गया…क्यूंकि उसके ससुर एयर इंडिया मे हैं और उसे डिस्काउंट मिला। मेरा बेबाकी कहां रुकने वाली थी…मेने कहा इसे डिस्काउंट नहीं, मुफ्त ही कहते हैं।
जब प्राइवेट ऑपरेटरों ने रखा कदम
जब प्राइवेट ऑपरेटर किंगफिशर और जेट एयरवेज मैदान में आए तो रही सही कसर निकल गई। खासकर घरेलु मार्किट में इनका बोलबाला हो गया। इनकी फ्लाइट के समय इस तरह से निर्धारित हुए कि जिन भी रूटों पर एयर इंडिया उड़ती थी, उन से 10 मिनट पहले का समय या तो किंगफिशर को दे दिया गया या जेट एयरवेज को मिल गया। अब जाहिर है ये सब नेताओं की मिलीभगत के बिना नहीं हो सकता। लेकिन ये बड़ा कारण था जिसने एयर इंडिया को घरेलु मार्किट से गायब कर दिया।
प्राइवेट सेक्टर को कामयाब करना पड़ा मंहगा
दरअसल एयर इंडिया को खत्म करने में प्राइवेट सेक्टर को कामयाब बनाने की कोशिश करने वालों का बड़ा हाथ था। लेकिन इस सब के बीच ये समझना भी जरूरी है कि सरकार का काम बिजनेस करना नहीं होता और ख़ासकर भारत जैसे देश में तो कतई नहीं, जहां सब कुछ राजनीति से जुड़ा हो। ऐसे में कमर्शियल वेंचर फेल हो ही जाते हैं। राजनीतिक और अफसरशाही की दखलंदाजी इसकी बड़ी वजह है।

निजीकरण मजबूरी भी और जरूरी भी
अब इन हालातों में एक बेहतरीन एयरलाइन को खत्म होने से बचाने के लिए उसका निजीकरण होना जरूरी था। खैर देर आए दुरस्त आए की तर्ज़ पर मोदी सरकार का ये एक और फैसला आने वाले समय में मील का पत्थर साबित होगा।
जिसका काम उसी को साजे
आखिर में इतना ही कहूँगा कि जिसे जो चलाना जानता है उसे वो चलाने देना चाहिए।किसी ने सच ही कहा है कि “जिसका काम उसी को साजे और करे तो डंडा बाजे”। सरकार का काम देश चलाना है और उद्योगपतियों का काम व्यापार करना। अभी के लिए तो एयर इंडिया और टाटा को शुभकामनाएं। बाकी लेख पढने वालों की प्रतिक्रिया का इंतजार जरुर रहेगा और उन किस्सों का भी जो कभी एयर इंडिया के साथ आपने महसूस किये हों या देखे हों।


