स्पेशल डेस्क: देशभर में चार नवंबर को दीपावली पर्व धूमधाम से मनाया गया लेकिन हिमाचल प्रदेश के सिरमौर, कुल्लू, मंडी और शिमला के ऊपरी क्षेत्रों में दिवाली के एक महीने बाद बूढ़ी दिवाली मनाई जाती है।
सदियों से मनाई जा रही बूढ़ी दीपावली
अनूठे तरीके से मनाई जाने वाली बूढ़ी दिवाली में दीये की जगह मशालें जलाई जाती हैं और वाद्ययंत्रों की थाप पर स्थानीय लोग दो से तीन दिन तक झूमते हैं। सदियों से मनाई जाने वाली बूढ़ी दीपावली पर्व में आज भी पुरातन संस्कृति की झलक देखने को मिलती है।
मशालें जलाकर होता है जश्न का आगाज
हिमाचल प्रदेश के इन इलाकों में आज भी सदियों पुरानी अनूठी परंपरा का निर्वहन हो रहा है। यहां के अधिकांश गांवों में बूढ़ी दिवाली मनाई जाती है। बूढ़ी दिवाली के दौरान रात में मशालें जलाई जाती हैं जिसे सुबह तक जलाए रखा जाता है। इसके साथ ही रात भर लोक वाद्ययंत्रों की थाप पर नाटियों का दौर चलता रहता है।
नगाड़ों की थाप पर होता है नृत्य
मंडी और कुल्लू के इलाकों में मशालों व अश्लील जुमलों से भूत-पिशाच भगाए जाते हैं। इसमें अश्लील जुमले कसते हुए ढोल नगाड़ों की थाप पर नृत्य और पुरानी परंपरा का निर्वहन किया जाता है। बूढ़ी दिवाली में दो गांवों के लोगों के बीच लड़ाई भी होती है। दोनों गांवों के लोग मशालों से एक-दूसरे पर वार करते हैं। पहाड़ों में ये जश्न 2 से 4 दिन तक चलता है।
बूढ़ी दिवाली में बनते हैं कई तरह के पकवान
बता दें कि दीपावली से एक माह पूर्व सिरमौर जिला के गिरिपार क्षेत्र में बूढ़ी दीपावली की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। गृहिणियां धान के चिवड़ा, गेहूं को उबालकर उसे सूखाने के बाद भून कर मूड़ा बनाया जाता है। शाकुली (पापड़) और चावलों की खीलें भी बनाई जाती हैं, जो अखरोट और भांग के साथ घर में आने वाले सभी मेहमानों और आगंतुकों को पूरे माह परोसा जाता है।
जाने क्या है मान्यता
प्रचीन मान्यताओं के अनुसार, 14 वर्ष का वनवास पूरा होने के बाद जब माता सीता बहु बनकर घर आईं थीं तब महालक्ष्मी के रूप में उनका अयोध्या में बूढ़ी महिलाओं ने जोरदार स्वागत किया था। लेकिन एक माह बाद अमावस्या के दिन बहुओं ने बूढ़ी महिलाओं को भी वही मान-सम्मान वापस दिया। उसी याद में बूढ़ी दीपावली भी मनाई जाती है।







