अरविंद कंवर : की कलम सेजिस दिन सुशांत सिंह राजपूत दुनिया छोड़ कर गए, बहुत तकलीफ हुई. तकलीफ इसलिए क्योंकि आम परिवार से निकले बहुत कम लोग इस दुनिया में अच्छे मुकाम पर पहुंच पाते हैं और चूंकि हम एक गैर व्यावसायिक परिवार से हैं तो हमारे लिए ऐसे लोग एक प्रेरणा का स्त्रोत जरूर रहते हैं.
दिल बेचारा देखी. सुशांत सिंह राजपूत की आखिरी फिल्म, उसकी बाकी फ़िल्मों की तरह कुछ कमर्शियल ढूंढ रहा था, मस्ती की भी उम्मीद कर रहा था पर ऐसा नहीं था. फिल्म एक ऐसे विषय पर बनी है कि जो शायद अपने जीवन के आखिरी पड़ाव में इंसान सोच रहा होता है. देख कर ऐसा महसूस हुआ कि क्या वाक्या में इंसान को अपने जाने का एहसास हो जाता है जो वो उन्ही विचारों से जुड़ जाता है जो उसकी तमन्नाओं के आखिरी मुक़ाम होते हैं. दिल बेचारा देख कर तो यही एहसास हुआ कि शायद यह फिल्म करती बार सुशांत को पता था कि उसकी जिंदगी कितनी बाकी है. हम बहुत कुछ ऐसा कर रहे होते हैं जो कहीं ना कहीं हम से जुड़ा हुआ होता है. हम सोचते हैं कि हम यह करेंगे और वो करेंगे पर हो कुछ और जाता है. जब जिंदगी में एक ऐसा समय आए जब अकेले हों तो क्या करें. एक बात तो यह है कि दोस्तों से, परिवार से बात करें पर अगर किसी की जिंदगी में ऐसा भी समय आए कि ना कोई दोस्त हो और ना परिवार और ना कोई और तो उसे एहसास हो जाता है कि वो कहाँ जा रहा है. सुशांत की आखिरी फिल्म भी यही एहसास करवा कर गई है कि शायद इंसान अपना आखिरी समय जानता है. आभास हवाओं में हमेशा होता हैलेखक खबर Now के सम्पादक हैं






