शिमला: उमंग लगातार बेसहारा और लावारिस घूमते लोगों की मदद के लिए आगे आती रही है। नए मामले में जायस घाटी में लगभग 2 दिन पहले एक व्यक्ति को दयनीय हालात में बारिश में भटकते हुए देखा गया और जैसे ही इसकी जानकारी उमंग फाउंडेशन के पास पहुंची तो फाउंडेशन के प्रयासों से उसे पुलिस ने रेस्क्यू करके इंदिरा गांधी मेडिकल अस्पताल के मनोचिकित्सा विभाग में दाखिल कराया, और यह बारिश में भटकते रोगी को एक ठिकाना मिल गया।
बेतरतीब बढ़ी हुई गंदी दाढ़ी व बाल, बदबूदार कपड़े, बारिश में नंगे पैर में दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर एक अनाम शख़्स। जिसका मानसिक संतुलन बिगड़ा हुआ है और अपने नाम, घर-पते से बेखबर न जाने कैसे भटक कर ठियोग के पास जायस घाटी पहुंच गया और 2 दिन पहले जायस घाटी के स्थानीय निवासी (आशु) चमन ने जब इस दयनीय हालात में बारिश में भटकते हुए व्यक्ति को देखा। तो वह भी अपना दया भाव नहीं रोक पाए और आशु ने अपने सामाजिक दायित्व को निभाते हुए इंटरनेट से स्टेट मेंटल हेल्थ अथॉरिटी के सदस्य और उमंग फाउंडेशन के अध्यक्ष प्रो. अजय श्रीवास्तव का नंबर ढूंढ कर उन्हें फोन किया और उस व्यक्ति को बचाने के लिए कहा। जिसके बाद इस व्यक्ति को रेस्क्यू करके आई एम से शिमला के मनोचिकित्सा विभाग में दाखिल कराया गया।
इस मामले पर जानकारी देते हुए प्रो. अजय श्रीवास्तव ने बताया कि मेंटल हेल्थ एक्ट 2017 में सड़कों पर घूमने वाले बेसहारा मनोरोगियों को रेस्क्यू करके अस्पताल में भर्ती कराने का प्रावधान है। कानून ने यह दायित्व पुलिस को दिया है। पुलिस ऐसे मनोरोगी को रेस्क्यू करके जुडिशल मजिस्ट्रेट से इलाज के लिए आदेश प्राप्त करती है। फिर उस का मुफ्त इलाज किया जाता है। प्रदेश हाईकोर्ट ने भी इस बारे में स्पष्ट आदेश किए थे कि पुलिस इस कानून का सख्ती से पालन करे।
ठियोग के डीएसपी लखबीर सिंह को फोन कर अजय श्रीवास्तव ने उस गुमनाम मनोरोगी को रेस्क्यू करने का अनुरोध किया। उन्होंने तुरंत कॉन्स्टेबल गुलाब सिंह बिजटा को मौके पर भेजा। पुलिस के पहुंचने तक आशु चमन ने उस मनोरोगी को भगाने नहीं दिया। ठियोग पुलिस की संवेदनशीलता से एक बेसहारा मनोरोगी को बचा लिया गया।
आईजीएमसी अस्पताल के मनोचिकित्सा विभाग के अध्यक्ष डॉ. दिनेश शर्मा ने कहा कि इस मनोरोगी के लक्षण देखकर लगता है कि इलाज के बाद इसकी याददाश्त वापस आ सकती है। उन्होंने कहा कि असली संतोष तो तब मिलेगा जब यह अपने घर वापस चला जाएगा।
उल्लेखनीय है कि उमंग फाउंडेशन द्वारा बेसहारा मनोरोगियों को बचाने का जनांदोलन चलाने के बाद आम नागरिकों की सजगता से पिछले कुछ वर्षों में 300 से अधिक मनोरोगियों को रेस्क्यू कराया जा चुका है। इनमें से अनेक याददाश्त वापस आने के बाद अपने घरों को भी भेजे जा चुके हैं। किसी भी मनोरोगी को बेसहारा भटकता देख कोई भी व्यक्ति पुलिस को सूचना देकर उसे रेस्क्यू करवा सकता है।






